भारत में महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत ने स्वतंत्रता के समय ही महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया। तब कई विकसित देशों में भी महिलाएँ वोट नहीं डाल सकती थीं।
लेकिन अधिकार मिलना और राजनीति में सक्रिय होना — दोनों अलग बातें हैं।
समस्या यह थी:
- राजनीति को पुरुष-प्रधान क्षेत्र माना जाता था
• सामाजिक मान्यताएँ महिलाओं को पीछे रोकती थीं
• आर्थिक निर्भरता निर्णय लेने में बाधा थी
• शिक्षा के अवसर सीमित थे
फिर भी, भारत में इंदिरा गांधी, सरोजिनी नायडू, सुचेता कृपलानी जैसी महिलाओं ने राजनीति में नई राहें बनाई।
2) आज भारत में संसद और विधानसभाओं में महिलाएँ कितनी हैं?
संसद में स्थिति
लोकसभा में लगभग 15% से कम महिलाएँ हैं।
राज्यसभा में यह संख्या इससे भी कम है।
यह दुनिया के औसत 25% से काफी नीचे है।
विधानसभाओं में स्थिति
भारत के अधिकांश राज्यों में:
- महिलाओं की संख्या 5–12% के बीच है
• कई राज्यों में 10 से भी कम महिला विधायक हैं
• मंत्री पदों में महिलाओं का अनुपात अत्यंत कम है
इससे पता चलता है कि राष्ट्रीय हो या राज्य स्तर — निर्णय लेने वाली सीटों पर महिलाओं की उपस्थिति अभी भी बहुत कम है।
3) स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण ने क्या बदलाव लाए?
भारत ने 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायत और नगरपालिका चुनावों में 33% महिला आरक्षण लागू किया।
कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया।
इसके बाद बड़े बदलाव दिखे:
- लाखों महिलाएँ पहली बार सार्वजनिक जीवन में आईं
• गाँव और शहरों में महिला नेतृत्व बढ़ा
• शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता मिली
• महिलाओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए
• निर्णय लेने में संवेदनशीलता और पारदर्शिता आई
◆ आलोचकों ने यह भी कहा कि कई जगह "सरपंच पति" या "प्रधान पति" हावी रहते हैं।
लेकिन धीरे-धीरे महिलाएँ नेतृत्व की मुख्य भूमिका में आने लगीं।
4) महिला आरक्षण बिल (Nari Shakti Vandan Act): क्या है, क्यों महत्वपूर्ण है?
2023 में केंद्र सरकार ने संसद में 33% महिला आरक्षण बिल पास किया।
इसका उद्देश्य है—
- लोकसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों
• सभी राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण लागू हो
• महिला नेतृत्व को समान मौका मिले
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
- महिलाओं की कुल आबादी लगभग 50% है
• लोकतंत्र में बराबर भागीदारी आवश्यक है
• नीतियाँ balanced और inclusive बनेंगी
• महिलाओं की आवाज़ सीधे संसद तक पहुँचेगी
◆ हालांकि यह बिल जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया के बाद लागू होगा, लेकिन यह भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव का संकेत देता है।
5) राजनीति में महिलाओं के आने से क्या बदलता है?
जब महिलाएँ राजनीति में सक्रिय होती हैं, तो निर्णय लेने का तरीका बदलता है।
महिला नेतृत्व के सकारात्मक प्रभाव:
♦ परिवार और समाज से जुड़े मुद्दों पर बेहतर संवेदनशीलता
♦ शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा जैसे विषयों को प्राथमिकता
♦ भ्रष्टाचार के खिलाफ अधिक सख्ती
♦ सामुदायिक सहयोग और संवाद में सुधार
♦ स्थानीय विकास कार्यों में तेज़ी
महिलाएँ practical और community-driven फैसले लेती हैं, जिससे समाज पर सीधा असर होता है।
6) राजनीति में महिलाओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
(1) सामाजिक बाधाएँ
- राजनीति को पुरुष-प्रधान क्षेत्र माना जाता है
• महिलाओं पर घरेलू जिम्मेदारियाँ अधिक
• परिवारिक समर्थन हर जगह नहीं मिलता
(2) आर्थिक कठिनाइयाँ
➤ चुनाव लड़ना महंगा है
➤ कई महिलाएँ आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं
➤ फंडिंग और संसाधनों का अभाव
(3) राजनीतिक दलों की नीतियाँ
- टिकट वितरण में महिलाओं को प्राथमिकता नहीं
• महिलाओं को अक्सर कमजोर सीटें मिलती हैं
• नेतृत्व पदों पर पहुँचने के अवसर सीमित
(4) सुरक्षा और सामाजिक छवि
♦ चुनाव अभियान में सुरक्षा की समस्या
♦ सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग
♦ चरित्र हनन की कोशिशें
इन चुनौतियों के बावजूद महिलाएँ लगातार आगे बढ़ रही हैं।
7) राजनीति में महिला नेतृत्व के सफल उदाहरण
भारत में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई सफल महिला नेता उभर कर आईं:
- इंदिरा गांधी — भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री
• प्रतिभा पाटिल — पहली महिला राष्ट्रपति
• ममता बनर्जी — पश्चिम बंगाल की शक्तिशाली मुख्यमंत्री
• जयललिता — तमिलनाडु की लोकप्रिय नेता
• वसुंधरा राजे — राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री
• मेनका गांधी, स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण — राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली मंत्री
इनकी सफलता ने साबित किया कि महिलाएँ प्रशासन और राजनीति दोनों में सक्षम हैं।
8) महिलाओं का बढ़ता राजनीतिक भविष्य — क्या उम्मीदें हैं?
भारत तेजी से बदल रहा है।
शिक्षा, शहरों का विकास, डिजिटल जागरूकता और सामाजिक सोच में परिवर्तन ने महिलाओं के लिए नए मौके खोले हैं।
भविष्य में ये रुझान देखे जा रहे हैं:
♦ महिला मतदाता तेजी से बढ़ रहे हैं
♦ कई राज्यों में महिला वोट turnout पुरुषों से ज्यादा है
♦ राजनीतिक दल अब महिलाओं को अधिक टिकट दे रहे हैं
♦ पंचायत और नगर निकायों का अनुभव राजनीति की सीढ़ी बन रहा है
♦ महिला आरक्षण लागू होने के बाद संसद में महिलाओं की संख्या दोगुनी से अधिक हो सकती है
इससे भारत की राजनीति संतुलित, समावेशी और अधिक संवेदनशील बनेगी।
निष्कर्ष (Conclusion)
महिला प्रतिनिधित्व सिर्फ सीटों का मुद्दा नहीं है — यह लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़ी बात है।
भारत ने स्थानीय निकायों में आरक्षण देकर एक बड़ी शुरुआत की है। अब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की समान भागीदारी समय की मांग है।
- राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति सामाजिक संतुलन लाती है
• नीतियाँ अधिक समावेशी बनती हैं
• देश का लोकतंत्र मजबूत होता है
भविष्य भारतीय राजनीति में महिला साझेदारी का स्वर्णिम अध्याय लिख सकता है — बशर्ते समान अवसर, राजनीतिक प्रशिक्षण और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित किया जाए।